रविवार, 15 अप्रैल 2018

नो कंडिडेट!

15 अप्रैल
दो महीने बाद बिजली विनियामक आयोग के चेयरमैन नारायण सिंह रिटायर हो जाएंगे। चीफ सिकरेट्री लेवल के इस पोस्ट के लिए राज्य में कोई नौकरशाह खाली नहीं है। जो थे, वे सभी इंगेज हो चुके हैं। एमके राउत मुख्य सूचना आयुक्त, विवेक ढांड रेरा चेयरमैन, डीएस मिश्रा सहकारिता आयोग चेयरमैन, एनके असवाल रेरा मेम्बर। इनके अलावा इस साल कोई आईएएस रिटायर नहीं हो रहे। हालांकि, प्रिंसिपल सिकरेट्री लेवल में जीएस मिश्रा खाली हैं। वे अगर दम लगा दिए तो ठीक है वरना, मुख्य सूचना आयुक्त की तरह बिजली विनियामक आयोग की कुर्सी भी किसी नौकरशाह के रिटायर होने की प्रतीक्षा में साल, डेढ़ साल तक खाली रह जाए, तो आश्चर्य नहीं।

मोदी की मेमेरी

आमतौर पर राजनेता भाषण से पूर्व नामों को नोट कर लेते हैं। लेकिन, जांगला के भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोगों को अहसास कराया कि उनकी याददश्त गजब की है। पूरे भाषण में उन्होंने छत्तीसगढ़ से जुड़े दो दर्जन से अधिक नामों को लिया। और, वो भी बिना देखे। आटो चलाने वाली सविता की तो ड्रोन बनाने वाली लक्ष्मी की भी। भोपालपटनम से लेकर भद्राचलम, कांकेर, दंतेश्वरी माई, भैरमगढ़ के भैरम बाबा, भानुप्रताप, राजनांदगांव आदि के वे नाम ऐसे ले रहे थे, जैसे छत्तीसगढ़ में उन्होंने लंबा समय बिताया हो। 58 मिनट का संबोधन समाप्त होने के बाद लोग उनकी मेमोरी को दादा दे रहे थे।

अफसर की मुश्किलें

सूबे के एक अफसर की मुश्किलें बढ़ सकती है। एक आरटीआई कार्यकर्ता ने अफसर के दोस्त की संदेहास्पद परिस्थितियों में हुई मौत को त्रिकोणीय प्रेम संबंध का अंजाम बताते हुए जांच के लिए सीबीआई को लेटर लिखा है। सीबीआई ने अगर केस ले लिया तो बवाल मच सकता है।

कलेक्टरों की सूची

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बस्तर दौरे की वजह से कलेक्टरों की पूरी लिस्ट नहीं आ पाई थी। सरकार ने सिर्फ छह कलेक्टरों का ही ट्रांसफर किया था। बलरामपुर, बेमेतरा, मुंगेली, बलौदाबाजार, जांजगीर और कवर्धा। पीएम के लौटने के बाद बचे जिलों के कलेक्टरों की धड़कनें फिर तेज हो गई है। वजह यह है कि विधानसभा चुनाव सामने होने के कारण अब रिश्ते-नाते नहीं निभाए जा रहे। देखा नहीं आपने, जांजगीर जिले को सौरभ कुमार के लिए रिजर्व रखने की बात चल रही थी और पोस्टिंग हो गई नीरज बंसोड़ की। इसी तरह अवनीश शरण को किसी दीगर जिले में भेजने की बजाए सरकार ने कवर्धा में उनकी उपयोगिता ज्यादा समझी। दूसरी लिस्ट में जिन कलेक्टरों के नम्बर लग सकते हैं, उनमें मध्य और दक्षिण छत्तीसगढ़ के आधा दर्जन जिले हैं। इनमें से कई को चुनावी दृष्टि से दूसरे जिलों में बिठाया जाएगा। वहीं, एक-दो रायपुर बुलाए जाएंगे।

लक्की जिला

बलरामपुर कलेक्टर अवनीश शरण को कवर्धा का कलेक्टर बनाया गया है। बलरामपुर पांच ब्लॉक का जिला था और कवर्धा चार का। अवनीश अपनी नई पोस्टिंग से कितना खुश होंगे यह तो नहीं पता। लेकिन, सीएम के गृह जिला का इम्पॉर्टेंस के साथ ही कवर्धा कलेक्टरों के लिए काफी लक्की रहा है। मसलन, सोनमणि बोरा का कवर्धा दूसरा जिला रहा। लेकिन, इसके बाद वे रायपुर और बिलासपुर जैसे सूबे के दोनों बड़े जिले के कलेक्टर रहे। सिद्धार्थ कोमल परदेशी का कवर्धा पहला जिला रहा। उसके बाद वे लगातार तीन जिले के कलेक्टर रहे। वीवीआईपी जिला राजनांदगांव के साथ ही राजधानी रायपुर और न्यायधानी बिलासपुर के भी। मुकेश बंसल भी कवर्धा के बाद रायगढ़ और राजनांदगांव के कलेक्टर रहे। मुकेश अगर कलेक्टरी से अरुचि नहीं दिखाए होते तो संभव था कि अभी कोई और जिले के वे कलेक्टर होते। दयानंद पी भी कवर्धा के बाद कोरबा और अब बिलासपुर की कलेक्टरी कर रहे हैं। धनंजय देवांगन कवर्धा से ही जगदलपुर गए। नीरज बंसोड़ भी रवि शास्त्री जैसी बैटिंग करने के बाद भी जांजगीर जैसा जिला पाने में कामयाब हो गए। कहने का आशय यह है कि कवर्धा जिला कलेक्टरों के कैरियर की दृष्टि से काफी बढ़ियां रहा है।

हार्ड लक

बड़े जद्दोजहद और गुणा-भाग के बाद एसीएस होम बीवीआर सुब्रमण्यिम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीजापुर कार्यक्रम का प्रभारी बनाया गया था। मगर पीएम का बीजापुर दौरा निरस्त हो गया। जाहिर है, प्रधानमंत्री के कार्यक्रमों का प्रभारी बनने से अफसरों को एक्सपोजर मिलता है। कार्यक्रम अगर बढ़ियां हो गया तो सीएम से शाबासी भी। सुब्रमण्यिम को वास्तव में इसकी दरकार भी है। बेचारे जब से दिल्ली से आए हैं, गृह विभाग से पीछा नहीं छूट रहा है।

गाइडलाइन पर सवाल

कुछ महीने पहिले सीएम की राजनांदगांव सभा में कुछ व्यवधान पहुंचा था तो सरकार से कलेक्टरों को गाइडलाइन जारी हुई थी। कलेक्टर सीएम के कार्यक्रम की विस्तृत जानकारी सरकार को भेजेंगे। यही नहीं, कार्यक्रम में कुछ भी गड़बड़ हुआ, तो उसके लिए वे जिम्मेदार होंगे। लेकिन, पिछले हफ्ते कोरिया में माता कर्मा जयंती के कार्यक्रम में गाइडलाइल को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। आयोजकों ने कार्यक्रम को राज्य स्तरीय बताकर सीएम से टाईम ले लिया। लेकिन, जब सीएम समरोह में पहंचे तो पता चला जिला स्तरीय आयोजन था। भीड़ भी जिला स्तरीय के हिसाब से ही आई थी। ऐसे में, कोरिया के बीजेपी नेताओं को बगले झांकने के अलावा कोई चारा नहीं था।

पुनिया का प्रयास

कांग्रेस के प्रभारी पीएल पुनिया के एका के प्रयासों पर पार्टी के नेता ही पलिते लगा रहे हैं। चुनाव अभियान समिति की बैठक में तो पुनिया के सामने ही आपस की कलह खुलकर सामने आ गई। वो भी इस कदर कि घर-परिवार के लोगों पर भी हमले किए जाने लगे। पुनिया भी आवाक थे कि ये हो क्या रहा है। चलिये, बीजेपी और जोगी कांग्रेस के लिए इससे बड़ी खुशी की बात क्या हो सकती है।

एक और आदिवासी नेता

छत्तीसगढ़ की राजनीति ने एक और आदिवासी नेता को सुनियोजित तौर पर निबटाने की कोशिशें हुई हैं। बताते हैं, अंबिकापुर में टीएस सिंहदेव जैसे प्रभावशाली नेता के सामने खड़े होने के लिए भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं है। चर्चा थी कि सरगुजा सांसद कमलभान को बीजेपी वहां उतार सकती है। लेकिन, कमलभान का अश्लील गालियों का ऐसा आडियो टेप वायरल किया गया कि वे अब सफाई दे पाने की स्थिति में भी नहीं हैं। हालांकि, टेप सुनने से लगता है, उन्हें ट्रेप किया गया है। चलिये, कांग्रेस के लिए अब अंबिकापुर सीट और मजबूत हो जाएगी।

अंत में दो सवाल आपसे

1. सरकार ने बेमेतरा कलेक्टर कार्तिकेय गोयल और कवर्धा कलेक्टर नीरज बंसोड़ को 10 महीने में ही क्यों बदल दिया?
2. आखिर ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने आलोक अवस्थी का आर्डर निकाला कमिश्नर एग्रीकल्चर का और तीसरे दिन उन्हें ग्रामोद्योग में भेज दिया?

बुधवार, 11 अप्रैल 2018

जीएडी का कमाल

8 अप्रैल
तीन महीने के भीतर यह दूसरा मौका होगा, जब सरकार को आईएएस, आईपीएस पोस्टिंग के अपने फैसले बदलने पड़े। याद होगा, एसपी के ट्रांसफर में एमआर अहिरे को बीजापुर और मोहित गर्ग को गरियाबंद का एसपी बनाया गया था। लेकिन, 15 दिन के भीतर अहिरे को हटाकर गर्ग को बीजापुर का एसपी बनाना पड़ा। बीजापुर में जब नक्सली घटनाएं यकबयक बढ़ने लगी तो सरकार को लगा अहिरे को वहा पोस्ट करके भूल हो गई। पिछले हफ्ते आईएएस की लिस्ट में भी कुछ ऐसा ही हुआ। अंबलगन पी को पहले मार्कफेड से हटाकर सिकरेट्री पीएचई का प्रभार दिया गया। और, राजभवन के डिप्टी सिकरेट्री जन्मजय मोहबे को एमडी मार्कफेड का। लेकिन, चौथे दिन अचानक आर्डर में संशोधन करते हुए जीएडी ने अंबलगन को पीएचई के साथ फिर से मार्कफेड और मोहबे को बीज विकास निगम भेज दिया। याने चार दिन के भीतर मोहबे का दो ट्रांसफर। उपर से ट्रांसफर के 12 दिन बाद भी मोहबे राजभवन से रिलीव नहीं हुए हैं। कारण, उनकी रिलीवर रोक्तिमा राय रायगढ़ से अभी तक आई नहीं हैं। रोक्तिमा के आए बिना राजभवन मोहबे को रिलीव करेगा नहीं। और, मोहबे रिलीव नहीं होंगे तो आलोक अवस्थी बीज विकास निगम का चार्ज किसे देंगे। सब जीएडी का कमाल है।

पी का अंतर

आईएएस के ट्रांसफर में बीज विकास निगम के एमडी आलोक अवस्थी को सरकार ने कमिश्नर एग्रीकल्चर बनाया है। यह कैडर पोस्ट तो है, मगर राज्य में इसका कोई अस्तित्व नहीं है। 13 साल पहिले बीएस प्रजापति कमिश्नर रहे। उनके हटने के बाद इस पोस्ट को लोग भूल गए थे। 4 अप्रैल को सरकार ने आलोक के लिए झाड़-पोंछकर जब कमिश्नर के पद को आलमारी से बाहर निकाला तो लोगों को चौंकना स्वाभाविक था। क्योंकि, आलोक को गाड़ी-घोड़ा के साथ ही बैठने की व्यवस्था खुद करनी होगी। हालांकि, सात अप्रैल की शाम सरकार ने आदेश में संशोधन करते हुए आलोक को कमिश्नर के साथ डायरेक्टर का भी प्रभार दे दिया। मगर आश्चर्यजनक सत्य यह है कि कृषि प्रधान राज्य में कृषि विभाग का ये हाल है कि उसके पास कोई पूर्णकालिक डायरेक्टर नहीं है। और जो प्रभारी डायरेक्टर हैं, उनके पास बैठने के लिए अपना कोई आफिस नहीं है। कृषि विश्वविद्यालय के कैम्पस में उधारी में कमरा लेकर प्रभारी डायरेक्टर बैठते हैं। उधर, इस पोस्टिंग पर मंत्रालय में लोग चुटकी ले रहे हैं….कृषि विभाग में अब दो-दो कमिश्नर होंगे। सुनील कुजूर एग्रीकल्चर प्रोडक्शन कमिश्नर याने एपीसी। और आलोक एग्रीकल्चर कमिश्नर। दोनों में सिर्फ पी का अंतर रहेगा। अंग्रेजी वर्णमाला का पी। वो वाला पी नहीं….आप इसका कुछ और मतलब मत निकालियेगा।

इलेक्शन रिकार्ड

पिछले चार साल में अगर किसी आईएएस का सबसे अधिक ट्रांफसर हुआ होगा, तो उनमें आलोक अवस्थी का नाम शायद सबसे उपर होगा। चार साल में उनके चार विभाग बदले। आलोक सिर्फ ट्रांसफर का रिकार्ड नहीं बना रहे हैं, बल्कि चुनाव कराने में भी नए कीर्तिमान की ओर बढ़ रहे हैं। कर्नाटक चुनाव को मिलाकर उनकी बारहवीं इलेक्शन ड्यूटी होगी। छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक इलेक्शन ड्यूटी का रिकार्ड एसीएस सुनील कुजूर के नाम दर्ज था। लेकिन, आलोक ने पिछले साल उनका रिकार्ड तोड़ दिया। अगले साल रिटायरमेंट से पहिले वे राजस्थान विधानसभा और उसके बाद लोकसभा का चुनाव कराएंगे। याने चौदह चुनाव। हालांकि, आलोक का रिकार्ड दो-एक साल से ज्यादा नहीं टिकने वाला। भूवनेश यादव तेजी से उनका पीछा कर रहे हैं। जल्द ही वे आठवां चुनाव कराने कर्नाटक रवाना होंगे। याने आलोक से सिर्फ चार पीछे। लेकिन, अभी उनकी नौकरी 18 साल बाकी है। जाहिर है, भूवनेश काफी आगे निकल जाएंगे।

संपत्ति का सवाल

वन विभाग से बाहर स्टेट डेपुटेशन पर पोस्टेड आईएफएस अफसर अभी तक विभागीय सचिव को कोई भाव नहीं देते थे। उनको लगता था कि वे तो सरकार में हैं….उनका कोई क्या कर लेगा….जब वन विभाग लौटेंगे तो देखा जाएगा। लेकिन, एसीएस फॉरेस्ट सीके खेतान ने जरा-सी चाबी क्या घुमाई, उन्हें दुआ-सलाम करने वाले अफसरों की लाइन लग गई है। दरअसल, खेतान ने आईएफएस की संपत्ति को लेकर क्वेरी चालू कर दी है। कुछ अफसरों ने जायदाद छुपाने के चक्कर में गल्तियां खूब की है। एक आईएफएस ने किसी साल कोई जमीन अपनी मां के नाम दिखाया है तो अगले साल वही जमीन पत्नी के नाम। तो तीसरे साल उसे ससुर से दान में मिलना बता दिया। ऐसे में, आईएफएस की परेशानी बढ़नी लाजिमी है।

बस्तर कलेक्टर कौन?

पीएम विजिट की वजह से भले ही कलेक्टरों का ट्रांसफर आगे-पीछे हो रहा है। लेकिन, महत्वपूर्ण यह भी है कि कुछ जिलों में कलेक्टर के लिए सरकार को विकल्प भी नहीं मिल रहे। मसलन, जगदलपुर। 5 अप्रैल को हाई लेवल पर एक घंटा चर्चा के बाद भी नाम फायनल नहीं हो पाया। खासकर, बस्तर के लिए सरकार को कोई नाम नहीं सूझ रहा है। लिस्ट बनती है, फिर कट जाती है। कवर्धा को लेकर भी उलझन की स्थिति है। वहां के लिए दो नाम सबसे उपर हैं, अवनीश शरण और सौरभ कुमार। इसी तरह प्रियंका शुक्ला का अगर जांजगीर हुआ तो अवनीश और सौरभ में से किसी एक को धमतरी भेजा जाएगा। ब्राम्हण बहुल बेमेतरा में जितेंद्र शुक्ला को भेजा जा सकता है। फिर पीएम विजिट कराने के बाद बीजापुर कलेक्टर अयाज तंबोली के लिए भी ठीक-ठाक जिला ढूंढना होगा। लिस्ट बनने में दिक्कत इसलिए जा रही है, क्योंकि, बड़े जिलों में सिर्फ बस्तर और दुर्ग कलेक्टर ही चेंज हो सकते हैं। दुर्ग का चांस थोड़ा कम ही है। रायपुर, बिलासपुर, अंबिकापुर, कोरबा और रायगढ़ में से एक को छोड़कर बाकी जिलों के कलेक्टरों को सरकार फिलहाल टच करने के मूड में नहीं है। बहरहाल, अभी फायनल कुछ भी नहीं हुआ है। जो भी है, वह सिर्फ चर्चा में है।

अब जुरी की बारी

अग्रवाल अफसरों के अब अच्छे दिन आ गए हैं। पहले आईपीएस केसी अग्रवाल को कैट ने राहत देते हुए भारत सरकार के उस फैसले को निरस्त कर दिया, जिसमें उन्हें फोर्सली रिटायर किया गया था। और, अब आईएएस बाबूलाल अग्रवाल के मामले में ऐसा ही आदेश आया है। बाबूलाल का आदेश तो वास्तव में चमत्कारिक है। और, सरकारी मशीनरी के लिए आंख खोलने वाला भी कि जल्दीबाजी और उतावलेपन की बजाए ठोक-बजाकर कार्रवाई करनी चाहिए। ताकि, वह स्टैंड कर सकें। बहरहाल, दोनों अग्रवालों के बाद अब दो पत्नी वाले एएम जुरी को भी कैट से राहत मिलना तय दिख रहा है। जुरी की सुनवाई अब अंतिम चरण में है।

राउत की कमी

प्रधानमंत्री विजिट के मौके पर सरकार को एमके राउत की कमी खल रही है। राउत ऐसे अफसर थे, जिन्हें पीएम के प्रवास की व्यवस्था की जिम्मेदारी देकर सरकार भूल जाती थी। उपर वालो को भरोसा रहता था कि राउत के रहते भीड़ से लेकर सब इंतजाम हो जाएगा। लेकिन, इस बार जिम्मेदारी तय करने को लेकर सरकार काफी उलझन में रही। काफी विचार-विमर्श के बाद बीजापुर का जिम्मा एसीएस होम बीवीआर सुब्रमण्यिम और जांगला, जहां ग्रामीण विकास की प्रदर्शनी होनी है, की जिम्मेदारी एसीएस पंचायत आरपी मंडल को सौंपी गई है।

इतिहास दुहाराता है

अजीत जोगी के हेलिकाप्टर को लैंड करने की इजाजत देने से बीजापुर प्रशासन ने मना कर दिया है। वजह, पीएम विजिट के कारण हेलीपैड का रिपेयरिंग किया जा रहा है। इस खबर से 2003 विस चुनाव के समय की घटना बरबस याद आ गई। बिलासपुर मेंं विद्याचरण शुक्ल की सभा थी। तय कार्यक्रम के अनुसार राजा रघुराज सिंह स्टेडियम में उनका हेलिकाप्टर उतरता। लेकिन, एक दिन पहिले डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने वीसी का हेलिकाप्टर उतरने से मना कर दिया। वो भी बिना किसी वजह। वीसी तब अंबिकापुर में थे। उन्हें सड़क मार्ग से रातोरात बिलासपुर के लिए निकलना पड़ा था।

अंत में दो सवाल आपसे



1. आईएएस के ट्रांसफर में अपने विभाग में एक अफसर को बिठाना किस मंत्री को नागवार गुजरा?
2. पीसीसी चीफ भूपेश बघेल के पिता की सक्रियता से भूपेश को लाभ होगा या नुकसान?

सोमवार, 26 मार्च 2018

निर्वाचन की तलवार

25 मार्च
मन कैबिनेट ने 23 मार्च को एक अतिरिक्त मुख्य निर्वाचन अधिकारी का पद क्रियेट कर दिया। राज्य निर्वाचन कार्यालय में दो आईएएस पोस्ट हैं। एक सीईओ सुब्रत साहू और दूसरा ज्वाइंट सीईओ समीर विश्नोई। एडिशनल सीईओ का पोस्ट करने का मतलब है किसी सीनियर आईएएस को वहां डंप किया जाएगा। हालांकि, चुनाव के नजदीक आने पर एक एडिशनल सीईओ को पोस्ट किया जाता है। लेकिन, निर्वाचन में भला कौन जाना चाहेगा। बहरहाल, 2000 से 2006 बैच के बीच के किन्हीं तीन अफसरों के नामों का पेनल बनाकर राज्य सरकार अब चुनाव आयोग को भेजेगी। इनमें ज्यादा खतरा 2004 और 06 बैच को है। क्योंकि, 2002, 03 और 05 बैच के आईएएस न केवल मजबूती से क्रीज पर जमे हैं बल्कि सरकार से केमेस्ट्री भी उनकी बढ़ियां है।

नया हेल्थ सिकरेट्री

राज्य निर्वाचन अधिकारी सुब्रत साहू को चुनाव आयोग ने अब हेल्थ डिपार्टमेंट में काम करने की छूट देने से इंकार कर दिया है। सरकार के आग्रह पर चुनाव आयोग जुलाई से लेकर अब तक तीन बार सुब्रत को एक्सटेंशन दे चुका है। आखिरी बार उन्हें फरवरी में दो महीने की मोहलत मिली थी, जिसका टाईम 31 मार्च को समाप्त हो जाएगा। जाहिर है, 31 के बाद सुब्रत को हेल्थ से हटना पड़ेगा। और, उनकी जगह पर सरकार को नए सचिव की पोस्टिंग करनी होगी। हालांकि, सरकार के लिए यह मशक्कत भरा काम होगा। क्योंकि, अफसर हैं नहीं। स्पेशल सिकरेट्री रैंक के ठीक-ठाक अफसरों को सरकार ने किसी-न-किसी विभाग में बिठा दिया है। बच रही हैं सिर्फ रेणु पिल्ले और मनिंदर कौर द्विवेदी। रेणु फिलहाल रेवन्यू बोर्ड में मेम्बर हैं और मनिंदर डेपुटेशन के बाद छुट्टी पर हैं। मनिंदर भी अगले महीने के अंत तक लौट सकती हैं। अब, देखना है सरकार किसे हेल्थ की कमान सौंपती है।

कलेक्टरों की धड़कन

लोक सुराज जैसे-जैसे समापन की ओर बढ़ रहा है, कलेक्टरों की दिल की धड़कनें तेज होती जा रही हैं। जाहिर है, 31 मार्च के बाद कभी भी कलेक्टरों की बहुप्रतीक्षित लिस्ट निकल जाएगी। इसमें सात से आठ से दस कलेक्टर बदलेंगे। सरकार भी इस बार चुप्पी साधी हुई है। किसी को कोई संकेत नहीं मिल रहा है। यही वजह है कि राजधानी और न्यायधानी को छोड़कर सारे कलेक्टरों की नींद उड़ी हुई है….सरकार कहां पटकती है या फिर किस जिले में भेजेगी।

पुलिस पर शनि

पुलिस के ग्रह-नक्षत्र कुछ ठीक नहीं चल रहे हैं। आलम यह है कि अपराधों को रोकथाम करने वाली पुलिस अपराधिक गतिविधियों में लिप्त होकर खुद ही खबर बन जा रही है। कहीं रेप में कोई पुलिस वाला पकड़ा गया तो कहीं आपस में ही एक-दूसरे से भिड़ गए। दंतेवाड़ा में एक आईपीएस ने दो उप निरीक्षकों की धुनाई कर दी तो रायपुर और राजनांदगांव में एसआई ने हवलदार की पिटाई कर दी। एसटीएफ का एक जवान राजस्थानी महिला से रेप में फंस गया। हफ्ते के आखिरी दिन बिलासपुर के सिरगिट्टी थाने में आग लग गई। डीजीपी को बनारस के किसी पंडित को बुलाकर शनि की शांति के लिए पूजा-पाठ कराना चाहिए।

वन विभाग का ढाबा

शीर्षक आपको चौकाएंगी….वन विभाग का भला ढाबा कैसे हो सकता है। लेकिन, छत्तीसगढ़ के वन विभाग में कुछ भी हो सकता है। ढाबा भी। ढाबा भी कोई ऐसी-वैसी जगह पर नहीं। धरमपुर से गुजरने वाले एयरपोर्ट रोड पर। दरअसल, स्टेशन रोड के गेस्ट हाउस पर मानवाधिकार आयोग का कब्जा होने के बाद वन विभाग ने जीई रोड से लगे धरमपुरा में लग्जरी गेस्ट हाउस बनवाया है। नेता, अफसर, मीडिया जैसे फोकटिया प्रजाति से बचने अफसरों ने दिमाग लगाया, क्यों न किसी प्रायवेट पार्टी को रेस्टोरेंट का जिम्मा दे दिया जाए। बात जमी और फायनल हो गया। वन विभाग के एक अफसर को पंजाबी ढाबा का खाना बेहद पसंद है। सो, उन्होंने अपनी चलाकर उसे गेस्ट हाउस का काम दिला दिया। लेकिन, इस भूल का अहसास तब हुआ, जब हाल ही में वन विभाग के एक बड़े अफसर के कुछ रिश्तेदार गेस्ट हाउस में रुके। रात में रिश्तेदारों को अपने घर खाना खिलाकर जब वे उन्हें छोड़ने गेस्ट हाउस पहुंचे तो लड़खडाते हुए एक आदमी उनकी गाड़ी के गेट के पास आकर पूछ दिया, तुम कौन? अब अफसर के गुस्से का ठिकाना नहीं। खैर, ये तो होना ही था। सरकारी गेस्ट हाउस में सार्वजनिक ढाबा खुलेगा तो उसमें बाहरी लोग आएंगे ही। फिर, गेट पर अल्कोहल की जांच करने वाली मशीन तो लगी नहीं है।

संग्राम शिविर

सरकार का समाधान शिविर जैसे-जैसे अंतिम दिन की ओर बढ़ रहा है, वह संग्राम शिविर के रूप में बदलते जा रहा है। बिल्हा में बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष धरमलाल कौशिक का वहां के विधायक सियाराम कौशिक से विवाद हो गया तो दुर्ग के अहिरवारा में मंच पर कुर्सी को लेकर विधायक और पूर्व विधायक आपस में ही भिड़ गए। चुनाव के छह महीने पहिले ही राजनीतिक पार्टियों में इस कदर संग्राम छिड़ गया है तो फिर चुनाव आते-आते क्या होगा, समझा जा सकता है।

अंत में दो सवाल आपसे

1. अप्रैल के फर्स्ट वीक में कलेक्टरों के होने वाले ट्रांसफर में सरकार कितने जिलों के कलेक्टरों को रायपुर में डंप करेगी?
2. राज्य सभा चुनाव में कांग्रेस जोगी कांग्रेस से गच्चा खाई है या फिर अमित जोगी की धमकी की परवाह न कर कांग्रेस ने दो विधायकों को पार्टी से बाहर करने का मार्ग प्रशस्त होने दिया?

शनिवार, 24 मार्च 2018

डीएम के सारथी!

18 मार्च
सुकमा के धुर नक्सल प्रभावित इलाके में सीएम ने बाइक से सड़क निर्माण का जायजा लिया तो एक बाइक की स्टेयरिंग अमन सिंह ने संभाली और उनके पीछे बैठे डीजी नक्सल डीएम अवस्थी। यह दूसरा मौका था जब डीएम के सारथी बनें अमन। पिछले साल भी डीएम को पीछे बिठाकर अमन ने मोटरसायकिल चलाई थी। इसके बाद भी डीएम की मन की बातें पूरी नहीं हो रही तो सवाल तो उठेंगे ही….अमन जैसे सारथी के बाद भी डीएम के डीजी पदनाम के आगे से आखिर नक्सल हट कर पी क्यों नहीं जुड़ पा रहा है। या तो डीएम को सारथी को साधने नहीं आ रहा या फिर सारथी सधने को तैयार नहीं है।


रणनीतिक चूक



धरमलाल कौशिक राज्यसभा में जाते-जाते चूक गए। सरोज पाण्डेय बीजेपी की कंडिडेट नामित हो गई। बताते हैं, कंडिडेट के सलेक्शन में बड़ा गेम हो गया….यहां के लीडर उसमें मात खा गए। राज्य सभा से अजा के भूषणलाल जांगड़े रिटायर हो रहे हैं। उनकी जगह पर अगर किसी अजा नेता को ही राज्यसभा में भेजने पर बीजेपी नेता स्टैंड रहते तो यह नौबत नहीं आती। आखिर, पिछले चुनाव में अजा की 10 में से नौ सीटें बीजेपी की झोली में गई थी। कांग्रेस ने भी इसी वर्ग के पीएल पुनिया को प्रभारी बनाया है। जाहिर है, ऐसे में आलाकमान या गेम चेंजर नेता अनुसूचित जाति को नजरअंदाज नहीं कर पाते। लेकिन, अजा से बाहर आकर धरमलाल का नाम आगे बढ़ाने से उपर वालों को सामान्य वर्ग के कंडिडेट को आगे करने का मौका मिल गया। विशुद्ध तौर पर इसे रणनीतिक चूक कही जाएगी।


यह भी संयोग



राज्यसभा में बीजेपी में जिन दो नामों की चर्चा शुरू से रही, वे दोनों चुनाव हारे हुए थे। धरमलाल कौशिक बिल्हा विधानसभा से तो सरोज पाण्डेय दुर्ग संसदीय सीट से। सरोज के खिलाफ कांग्रेस ने जिस लेखराम साहू को उतारा, वो भी हारे हुए हैं। लेखराम पिछला चुनाव अजय चंद्राकर से हारे थे।


कांग्रेस का दांव



लगता है, पीसीसी चीफ भूपेश बघेल ने अपने सलाहकार बदल लिए हैं। बीजेपी ने धरमलाल को किनारे कर सरोज पाण्डेय का नाम राज्यसभा सीट के लिए आगे किया तो भूपेश ने लेखराम साहू को प्रत्याशी बनाने में देर नहीं लगाई। कांग्रेस को यह मालूम है कि जीतने की कोई संभावना नहीं है। लेकिन, साहू प्रत्याशी उतार कर ओबीसी की सिम्पैथी तो ले ही ली कांग्रेस ने। मैसेज यह भी दिया कि बीजेपी ने धरम को नजरअंदाज कर दिया परन्तु कांग्रेस ने ओबीसी पर भरोसा जताया।


कार्रवाई का अंदेशा



सीएम ने लोक सुराज में पुअर पारफारमेंस की वजह से गरियाबंद कलेक्टर श्रुति सिंह को हटा दिया। वैसे, सुबह जब सीएम के साथ अमन सिंह हेलीकाप्टर पर सवार हुए तो अफसरों को अंदेशा हो गया था, किसी का विकेट गिर सकता है। पिछले बार भी कोरिया और सूरजपुर के लोक सुराज में सीएम के साथ अमन गए थे। और वहां से लौटते ही रायपुर हेलीपैड पर सीएम ने मीडिया के सामने कोरिया और सूरजपुर कलेक्टर की छुट्टी का ऐलान कर दिया था।


नारी सशक्तिकरण



आईएएस में हुए छोटे फेरबदल में महिला नौकरशाहों का दबदबा बढ़ा है। प्रिंसिपल सिकरेट्री रीचा शर्मा को फूड के साथ सामान्य प्रशासन विभाग और एम गीता को महिला बाल विकास के साथ डीजी प्रशासन एकेडमी का चार्ज दिया गया है। इस फेरबदल के बाद सभी महिला ब्यूरोक्रेट्स के पास अब कम-से-कम दो विभाग हो गए हैं। इससे पहिले निहारिका बारिक के पास सिकरेट्री टूरिज्म, कल्चर और ग्रामोद्योग, शहला निगार के पास पीएचई के साथ तकनीकी शिक्षा, रीना बाबा कंगाले सिकरेट्री ट्राईबल, संगीता आर के पास स्पेशल सिकरेट्री लेबर का इंडिपेंडेंट चार्ज के साथ लेबर कमिश्नर। पहले जेंस ब्यूरोक्रेट्स में एक से ज्यादा विभाग को स्टेट्स सिंबल माना जाता था। तब महिला सिकरेट्री थीं भी नहीं। एकमात्र रेणु पिल्ले थीं। उनसे पहिले इंदिरा मिश्रा। लेकिन, पिछले दो-तीन साल में महिला सिकरेट्रीज की संख्या तेजी से बढ़ी हैं। और, पुरूषों की जगह महिलाएं लेने लगी हैं। अगले महीने के अंत तक मनिंदर कौर द्विवेदी भी छुट्टी से लौट आएंगी। सरकार अगर रेणु पिल्ले को बिलासपुर से रायपुर शिफ्थ कर दे तो मंत्रालय में आठ महिला सिकरेट्री हो जाएंगी। याने 40 परसेंट से अधिक.


गेस्ट हाउस का बिल



एक पीसीसीएफ लेवल के आईएफएस की बेटी की पिछले दिनों शादी हुई तो सर्किल के अफसरों ने गेस्ट हाउस का बिल थमा दिया। आईएफएस भी चौंके, मेरे ही बनवाए गेस्ट हाउस में मुझे ही बिल देना पड़ेगा। सर्किल के अफसरों को बुलाकर खूब बुरा-भला कहा। पीए से पूछे, इसका सीआर मत आगे बढ़ाना। पीए बोले, साब। सीआर तो आपने पहले ही वेरी गुड लिख दिया है। अब तो सिर धुनने के अलावा कोई चारा नहीं था।


बोवाज का लास्ट मंथ



राज्य वन अनुसंधान संस्थान के डायरेक्टर आरके बोवाज इस महीने रिटायर हो जाएंगे। बोवाज लंबे समय तक पीसीसीएफ रहे। आरके टम्टा को पीसीसीएफ बनाने के लिए सरकार ने उन्हें हटाकर अनुसंधान संस्थान का डायरेक्टर बना दिया था। बहरहाल, बोवाज के रिटायर होने के बाद सरकार को रिसर्च इंस्टिट्यूट में किसी पीसीसीएफ लेवल के अफसर को पोस्ट करना होगा।


गौरव की वापसी



95 बैच के आईएएस गौरव द्विवेदी की मंत्रालय में वापसी हो गई। पोस्टिंग भी ठीक-ठाक मिली है। सिकरेट्री स्कूल एजुकेशन। इसके साथ वे माध्यमिक शिक्षा मंडल के वे चेयरमैन भी होंगे। डेपुटेशन पर दिल्ली जा रहे विकास शील के पास ये विभाग थे। याने दिल्ली से आए अफसर को दिल्ली जाने वाले अफसर का विभाग मिल गया।


अंत में दो सवाल आपसे



1. सरगुजा जिला पंचायत के सीईओ अनुराग पाण्डेय किस लॉबी के शिकार हो गए?
2. क्या छत्तीसगढ़ का अगला हेल्थ सिकरेट्री कोई महिला हो सकती है?


वो सात कलेक्टर!


11 मार्च

पिछले साल 23 अक्टूबर को कलेक्टर्स कांफ्रेंस हुई थी। सरकार ने 27 में से 10 को आउटस्टैंडिंग, 10 को संतोषजनक और सात के काम को पुअर माना था। सरकार के सार्वजनिक ऐलान से लगा था कि सात की किसी भी समय छुट्टी हो जाएगी। लेकिन, छह महीना हो गया। कोई एक्शन नहीं। इस बीच सरकार ने कई कलेक्टरों को विदेश का सैर भी करा दिया। कलेक्टर भी चुपके से घूमकर आ गए। चालाकी से कोई फोटो-वोटो भी नहीं डाला सोशल मीडिया में। बहरहाल, सवाल यह है कि पुअर पारफारमेंस मानने के बाद भी कलेक्टरों पर कार्रवाई नहीं होगी, तो फिर कलेक्टर कांफ्रेंस को कलेक्टर्स गंभीरता से कैसे लेंगे। 

ट्वीट पर फसाद


राज्य के मुखिया का काम लोगों में प्रेम और सौहार्द्र स्थापित करना है। लेकिन, अपने मुख्यमंत्री के एक ट्वीट ने कई घरों में फसाद खड़ा कर दिया। महिला दिवस के एक रोज पहले डाक्टर साब ने अपनी पत्नी की फोटो शेयर करते हुए सपोर्ट के लिए उन्हें शुक्रिया किया। उस ट्वीट के बाद तो कई घरों में महाभारत छिड़ गई। पत्नियां कहने लगी, सीएम साब को देखो और एक आप हो! रायपुर में एक मंत्री की पत्नी ने यहां तक कह दिया, हमारे साथ फोटो खिंचाने से बचते हो....शपथ लेने के बाद हमारे तरफ देखे भी नहीं, और सीएम साब को देखो, उन्होंने मंच पर ही मैडम को गले लगा लिया था। झगड़े को खतम करने के लिए मंत्रीजी ने फिर महिला दिवस के दिन सोशल मीडिया में पत्नी संग फोटो शेयर किया। यही नहीं, एक एसीएस और दो प्रिंसिपल सिकरेट्री के घर जंग छिड़ गई। मंत्रालय से घर पहुंचते ही पत्नियों ने तंज कसा....सीएम साब का ट्वीट देखे हो....क्यों देखोगे? आज तक कभी मुझे क्रेडिट दिए हो....तुम जान लो, जो हो मेरी वजह से। शादी के बाद ही तुम इतना आगे बढ़े। मेरी पुण्याई से तुमको बडे़-बड़े विभाग मिल जा रहे हैं। वरना, तुम कहीं ऐसे-वैसे विभाग में पड़े होते। ये तो एक बानगी है...ऐसे प्रसंग अनेक घरों में सुनने को मिले।  


बड़ा नुकसान


कलेक्टरों का ट्रांसफर फिर टल गया है। अब लोक सुराज के बाद बदले जाएंगे कलेक्टर। पहले इसे सीएम के फॉरेन से लौटने के बाद किया जाना था। फिर, बजट सत्र के बाद। अब अप्रैल चला गया है। बार-बार ट्रांसफर का टलना राज्य के हित में नहीं। जिन कलेक्टरों का हटना तय है या फिर तलवार लटकी है, समझ सकते हैं उनका काम में कितना मन लगेगा। कलेक्टर भी मान चुके हैंं, अब जाना तय है तो ऐसे काम हाथ में क्यों लें, जिसे वे महीने-डेढ़ महीने में पूरा ही नहीं कर सकते। जाहिर है, ऐसे में राज्य का नुकसान होगा। जिन कलेक्टरों की बदलने की चर्चा है, उनमें दंतेवाड़ा, बीजापुर, जगदलपुर, दुर्ग, धमतरी, गरियाबंद, जांजगीर, बलरामपुर और जशपुर शामिल प्रमुख हैं।

सिंगल आर्डर


गरियाबंद कलेक्टर श्रुति सिंह डेपुटेशन पर यूपी जा रही हैं। उनका प्रॉसिजर भी पूरा हो गया है। लेकिन, कलेक्टरों के ट्रांसफर के लिए उनका रुका था। अब जबकि, ट्रांसफर टल गया है तो उनका सिंगल आर्डर निकल सकता है। श्रुति डायरेक्ट आईएएस हैं। खबर है, उनके जाने के बाद गरियाबंद में किसी प्रमोटी आईएएस को कलेक्टर बनाकर भेजा जाएगा।  

किस्मत का यू टर्न


रिटायर एडिशनल चीफ सिकरेट्री एनके असवाल को सरकार ने आखिरकार रेरा का मेम्बर अपाइंट कर दिया। उनके साथ रिटायर पीसीसीएफ आरके टम्टा की भी रेरा में ताजपोशी की गई है। पिछले साल मई में रिटायर होने वाले असवाल हालांकि, रेरा चेयरमैन के लिए ट्राई कर रहे थे। तब रेरा में कंपीटिशन टफ नहीं हुआ था। सरकार ने ढांड का नाम सूचना आयोग के लिए तय कर दिया था और राउत का छह महीने बाकी था। रेरा चेयरमैन के लिए तब रिटायर आईएएस डीएस मिश्रा और आईएफएस बीके सिनहा की चर्चा थी। इसलिए, असवाल ने देवेंद्र नगर के बंगले को चार महीने के लिए एक्सटेंशन करा लिया था। लेकिन, बाद में ढांड के सूचना आयोग को छोड़ रेरा चेयरमैन की दौड़ में शामिल हो जाने के बाद असवाल ने रेरा में पोस्टिंग की उम्मीद छोड़ दी। साथ ही मकान भी। बोरिया-बिस्तर समेट कर वे अपने गृह नगर जयपुर लौट गए थे। लेकिन, असवाल की किस्मत ने यू टर्न ली....चेयरमैन न सही प्रदेश के सबसे वजनदार बोर्ड के वे मेम्बर तो बन ही गए।

छोटी सर्जरी


प्रिंसिपल सिकरेट्री विकास शील डेपुटेशन पर भारत सरकार में जा रहे हैं। वहां उन्हें ज्वाइंट सिकरेट्री हेल्थ बनाया गया है। अगले हफ्ते वे किसी भी दिन वे यहां से रिलीव हो जाएंगे। उन्हें कार्यमुक्त किए जाने के साथ ही स्कूल एजुकेशन में किसी को पोस्ट किया जाएगा। जाहिर है, मंत्रालय में एक छोटी सी सर्जरी होगी। स्कूल एजुकेशन के साथ ही हो सकता है, एक-दो विभागों में और बदलाव हो जाए। क्योंकि, केडीपी राव का वनवास लंबा हो गया है। गौरव द्विवेदी को भी दिल्ली से आने के बाद सरकार ने शंट किया हुआ है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाने के बाद हो सकें सरकार रेणु पिल्ले को बिलासपुर रेवन्यू बोर्ड से वापिस लाए। वैसे, सरकार के सामने दिक्कत यह है कि स्कूल एजुकेशन में वह न्यू मॉडल को भी इमप्लीमेंट नहीं कर सकती। क्योंकि, इंडिविजूअल विभाग को संभालने वाले जूनियर अफसर अब सरकार के पास बचे नहीं हैं। सब कहीं-न-कहीं फिट हो चुके हैं। 

सरकारी शराब का दोष


होली में एक विधायक और टीआई भिड़ गए। लोग भी चौंके....विधायकजी तो ऐसे थे नहीं, बड़े मिलनसार हैं...टीआई का भी ऐसा ट्रेक रिकार्ड रहा नहीं। बाद में, पता चला दोष दोनों का नहीं था। पहले लोकल शराब ठेकेदार छत्तीसगढ़ के लोगों की सेहत का बड़ा ध्यान रखते थे। अल्कोहल की मात्रा कम करने के लिए बॉटलिंग करते समय 30 से 40 फीसदी पानी मिलाते थे। सरकारी दुकानों को इससे क्या मतलब। बाहर से आता है, और यहां उसे बेच देते हैं। तभी तो लोग बोल रहे हैं, आजकल बड़ा हार्ड हो गया है....थोड़े से में ही चढ़ जा रहा है। इसलिए, विधायक और टीआई एपीसोड को मीडिया को अब ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए। साल में एक बार होली आती है। फिर भी, अगर ठीकरा फोड़ना है, तो उसके लिए मंत्री अमर अग्रवाल उपयुक्त हैं। उन्होंने ही प्रायवेट ठेका बंद कराया। 


अंत में दो सवाल आपसे


1. गौरव द्विवेदी अगर प्रशासन अकादमी से हटे तो उनकी जगह पर किस आईएएस को वनवास के रुप में वहां भेजा जाएगा?
2. एनके असवाल और आरके टम्टा को रेरा का मेम्बर बनाने में किस रिटायर नौकरशाह की चली है?


सरकार की शार्ट मेमोरी या....

11 फरवरी

राज्य सरकार ने एक आईपीएस को एसपी बनाया और महीने भर में बदल दिया। आमतौर पर ब्यूरोक्रेसी में ऐसे उदाहरण कम मिलते हैं, जब महीने भर में किसी एसपी का विकेट उड़ गया हो। लेकिन, जब नक्सली वारदात बढ़ने लगी तो सरकार को लगा, गड़बड़ हो गया। फिर, एसपी को चेंज कर दिया गया। हालांकि, इस अफसर से सरकार को पहले भी झटका मिल चुका है। बात 2008 चुनाव के समय का है। उस दौरान वे रायपुर में एडिशनल एसपी ट्रैफिक थे। किसी बड़े बंगले से उनके पास कोई गाड़ी छोड़ने के लिए फोन आया। मगर इस अफसर ने अचार संहिता का हवाला देते हुए गाड़ी छोड़ने से मना कर दिया। तब लग रहा था कि सरकार गई और कांग्रेस की ताजपोशी होने ही वाली है। कुछ अफसर इसलिए अति उत्साहित हो गए थे। लेकिन, रिजल्ट आया तो पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। सरकार के शपथ लेने के बाद ट्रांसफर का पहला आर्डर इसी अफसर का हुआ था। लेकिन, सरकार का बड़ा दिल कहें या शार्ट मेमोरी, आईपीएस को एसपी बना दिया। 

एक और एसीएस


88 बैच के आईएएस केडीपी राव जल्द ही एडिशनल चीफ सिकरेट्री बन जाएंगे। वैसे, उनका प्रमोशन जनवरी से ड्यू है। लेकिन, पोस्ट खाली न होने के कारण उनका नम्बर नहीं लगा। विवेक ढांड के रिटायर होने के बाद अब एसीएस का एक पोस्ट खाली है। विधानसभा सत्र के बाद उनकी डीपीसी हो सकती है। राव फिलहाल, राजस्व बोर्ड के चेयरमैन हैं। राज्य में अभी चीफ सिकरेट्री को छोड़कर एसीएस रैंक के चार आईएएस हैं। सुनील कुजूर, सीके खेतान, आरपी मंडल और बीवी सुब्रमण्यिम। राव पांचवें एसीएस होंगे। उनका रिटायरमेंट भी नजदीक है। अगले साल ही। हालांकि, एन बैजेंद्र कुमार एनएमडीसी नहीं गए होते तो राव का एसीएस बनना आसान नहीं होता। क्योंकि, फिलहाल एसीएस लेवल पर कोई रिटायरमेंट नहीं है। चीफ सिकरेट्री अजय सिंह भी 2020 में रिटायर होंगे।


विकास को हेल्थ


सिकरेट्री स्कूल एजुकेशन विकास शील को भारत सरकार के हेल्थ डिपार्टमेंट में पोस्टिंग मिलना लगभग तय माना जा रहा है। इसके लिए उनकी फाइल भी बढ़ गई है। संकेत हैं, मार्च के फर्स्ट वीक या उसके आसपास उनका आर्डर निकल जाएगा। विकास शील यहां स्वास्थ्य विभाग संभाल चुके हैं। दिल्ली में ज्वाइंट सिकरेट्री हेल्थ का एक पोस्ट खाली था। लिहाजा, उन्होंने इसके लिए प्रयास किया। बताते हैं, पोस्ट भर न जाए, राज्य सरकार ने इसी बेस पर उन्हें डेपुटेशन के लिए एनओसी देने में देर नहीं लगाई। विकास के जाने के बाद सवाल यह है कि स्कूल शिक्षा का नया सिकरेट्री कौन होगा। नाम सिर्फ एक ही आ रहा है। गौरव द्विवेदी। अब देखना है, सरकार क्या निर्णय लेती है। 

सुब्रत को राहत


भारत निर्वाचन आयोग ने छत्तीसगढ़़ के चीफ इलेक्शन आफिसर सुब्रत साहू को हेल्थ सिकरेट्री के तौर पर मार्च तक काम करने की अनुमति दे दी है। आयोग ने तीसरी बार एक्सटेंशन दिया है। इससे पहिले 31 जनवरी को उनका टाईम खतम हो गया था। सरकार ने इसके बाद चुनाव आयोग को लेटर भेजा था। लेट से ही सही आयोग ने सुब्रत को राहत देने वाला फैसला दे दिया। सुब्रत को अब आगे भी दिक्कत नहीं होने वाली। मध्यप्रदेश कैडर के ओपी रावत अब चीफ इलेक्शन कमिश्नर बन गए हैं। लिहाजा, वे मार्च में फिर तीन महीने के लिए उनका एक्सटेंशन हो जाए, तो आश्चर्य नहीं। कुल मिलाकर सुब्रत किस्मती निकले। वरना, जीएडी ने उन्हें निर्वाचन में डंप करने का इंतजाम कर दिया था। अगर निर्वाचन आयोग ने उन पर नजरे इनायत नहीं की होती तो आप समझ सकते हैं, चुनाव आफिस में बैठकर अभी वे क्या करते।

दंतेवाड़ा की यूएसपी


एक समय था, जब दंतेवाड़ा की पोस्टिंग से अफसर घबराते थे। कोई वहां जाना नहीं चाहता था। था भी कुछ ऐसा ही। सरकार जिस अफसर से नाराज होती थी या जिसे किसी काम के लायक नहीं समझती, उसे वहां भेज दिया जाता था। लेकिन, ओपी चौधरी ने दंतेवाड़ा की ऐसी यूएसपी बढ़ाई कि वहां का कलेक्टर बनने के लिए नए आईएएस में होड़ मची हुई है। 2016 में जब सौरभ कुमार को वहां का कलेक्टर बनाया गया, तब भी यही स्थिति थी। बहुत कम लोगों को मालूम है कि दंतेवाड़ा का कलेक्टर बनने के लिए उन्हें एक महिला आईएएस के साथ तगड़ा संघर्ष करना पड़ा था। चूकि, सौरभ का जैक बहुत पावरफुल था, इसलिए उनकी पोस्टिंग हो गई थी। सौरभ का अब वहां से हटने का टाईम हो गया है। इसलिए, फिर कश्मकश शुरू हो गया है। अब, दंतेवाड़ा की पोस्टिंग का मतलब हम आपको बता देते हैं....वहां काम करने का स्कोप है तो कमाने का भी। ढाई सौ करोड़ का तो माईनिंग फंड है। ये सीधे कलेक्टर के हाथ में होता है। इस पैसे से अगर वह चाहे तो काम करके नाम कमा लें या फिर कमा कर खुद को मजबूत कर ले।

एससी को ही मौका?


विधानसभा का बजट सत्र समाप्त हो जाने के बाद सूबे में राज्य सभा चुनाव की सरगर्मियां चालू हो जाएगी। हालांकि, इसमें कांग्रेस के लिए कोई स्कोप नहीं है। बीजेपी के भूषणलाल जांगड़े रिटायर हो रहे हैं। जाहिर है, उनकी जगह पर बीजेपी का ही कोई चेहरा चुनकर दिल्ली जाएगा। वैसे, इस एक सीट के लिए बीजेपी के भीतर कई नाम लिए जा रहे हैं। लेकिन, चुनावी साल में सरकार के सामने मजबूरी यह होगी कि जांगड़े के बाद किसी अजा नेता को ही इसके लिए नामित करें। वरना, संदेश अच्छे नहीं जाएंगे। विरोधी पार्टियों को भी बोलने का मौका मिल जाएगा। ये अवश्य है, सत्ताधारी पार्टी इस वर्ग के किसी एक्टिव लीडर को राज्य सभा में भेजना चाहेगी। क्योंकि, जांगडे से पार्टी को कोई लाभ नहीं मिला।


अंत में दो सवाल आपसे


1. अजीत जोगी वास्तव में किस सीट से विधानसभा चुनाव लड़ेंगे?
2. सीएम के साथ अब सिकरेट्री लेवल से नीचे के अफसर विदेश नहीं जाएंगे, ऐसा क्यों?